नन्हीं नाबालिग रोजेदार आयशा ने रखा माहे रमजान का पहला रोजा

बढ़नी/सिद्धार्थनगर। जिले के ब्लाक बढ़नी अन्तर्गत दुधवनिया बुजुर्ग निवासिनी नन्हीं नाबालिग रोजेदार 6 बर्षीय आयशा पुत्री अब्दुल मोइद रविवार को माहे रमजान का पहला रोजा रखा है। जो मदरसा तालीमुल कुरआन दुधवनिया बुजुर्ग में कक्षा एक से पढ़ती है। रोजा रखने से न सिर्फ खुदा की रजा, क़ुर्बत और ख़ुशनूदी हासिल होती है, बल्कि जिस्मानी, रूहानी और समाजी ऐतबार से भी इससे बहुत से फायदे हैं। मजहब-ए-इस्लाम में हर बालिग मर्द और औरत पर साल में 29 या 30 दिन का रोजा रखना फर्ज है। इसको छोड़कर नाबालिग बच्चे भी रोजा रखते हैं। जिसको लेकर अल्लाह तआला ने नमाज, रोजा, हज, ज़कात, फ़ितरह जैसी इबादतों के अन्दर बहुत सारी बीमारियों का इलाज और शिफा रखी है। जब नाबालिग भी बड़ों के साथ नमाज पढ़ने के लिए जाते हैं, तो पाक होने के लिए सबसे पहले गुस्ल करते हैं, फिर हर नमाज के पहले वजू करते हैं, वजू के दौरान हाथ, पैर, नाक, कान, चेहरा, गला, सिर, बाल वगैरह सब धुलते हैं, तो इस तरह जिस्म की सारी गन्दगी खुद-ब-खुद दूर हो जाती है। फिर वे (नाबालिग) नमाज में खड़े होते हैं, दोनों हाथ उठते हैं, बांधते हैं, रूकुअ, सजदा करते हैं, बैठते हैं, सलाम के वक्त दाएं व बाएं गर्दन की फेरते हैं, तो यह सब जिस्मानी लिहाज से बहुत फायदेमन्द होता है। माहे रमजान में रोजा, सिर्फ खाने पीने से रुकने का नाम नहीं है, बल्कि वह जिस्मानी, रूहानी और समाजी दुरुस्तगी और इंसानी हमदर्दी, अखलाक और मुहब्बत को बढ़ावा देता है और कुदरत के नेअमतों का अंदाजा होता है। वहीं नन्हीं नाबालिग रोजेदार आयशा को माहे रमजान का पहला रोजा रखने पर माता-पिता सहित घरवालों, रिश्तेदार, गांववालों एवं क्षेत्रवासियों ने बधाई एवं शुभकामनाएं दी है।



