वेदों के ज्ञान का न तो आदि है और न अंत

वेद हमारी विरासत हैं। भाषा और सामाजिक व्यवस्था का जैसा रूप यहां है वह अन्य प्राचीन सभ्यताओं में नहीं है। सामाजिक सुव्यवस्था का सूत्रपात करने के कारण ही हम इसे वंदनीय मानते हैं।
कहा जाता है कि वेद अनंत हैं और वेदों के ज्ञान का न आदि है और न ही अंत है। वेदों के संपूर्ण ज्ञान को ऋषि वेदव्यास द्वारा 4 प्रकारों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ) में विभाजित किया गया था। महर्षि वेदव्यास दी द्वारा वेद को सृजित किया गया है। लेकिन वेदव्यास जी द्वारा वेदों को केवल लिपिबद्ध किया गया है।
वेदों को पढ़ने का कोई निश्चित क्रम नहीं है। बात यह है कि ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे पुराना और सबसे महत्वपूर्ण है, इसलिए ऋग्वेद को पहले पढ़ा जा सकता है। यद्यपि कि सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके 1875 मन्त्रों में से 99 को छोड़ कर सभी ऋग्वेद के हैं।
चारों वेदों की आध्यात्मिक परंपरा को संरक्षित करने की आवश्यकता है। वेदों के अनंत ज्ञानराशि की रश्मियां प्राचीन काल से ही भारतीय समाज को आलोकित करती रही हैं। ऋषियों और मुनियों द्वारा पोषित परंपरा के कारण ही सदियों से भारत विश्वगुरु रहा है।
लेखक विनय कांत मिश्र/दैनिक बुद्ध का संदेश




