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उत्तर प्रदेशसिद्धार्थनगर

मनरेगा नहीं, कागजी रोजगार का नेटवर्क, गडरखा से पूरे जिले तक फैला फर्जी हाजिरी खेल

राजेश शर्मा/दैनिक बुद्ध का संदेश
बढ़नी/सिद्धार्थनगर। जनपद सिद्धार्थनगर में मनरेगा योजना अब रोजगार नहीं, बल्कि कागजी हाजिरी और तयशुदा भुगतान का मॉडल बन गई है। आपको बता दें कि विकास खण्ड बढ़नी के ग्राम गडरखा में सामने आया मामला अब केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जिले में चल रहे मनरेगा भ्रष्टाचार की तस्वीर उजागर करता है। यहां एक ही कार्य पर पहले 222 और अब 137 मजदूरों की हाजिरी दिखाकर कागजी काम पूरे किये जा रहे हैं, जबकि जमीन पर न तो मजदूर दिखते हैं और न ही कोई कार्य हो रहा है। ग्राम पंचायत गडरखा की तस्वीर साफ बताती है कि मनरेगा का संचालन अब जमीनी जरूरतों पर नहीं, बल्कि फाइलों की सुविधा के हिसाब से किया जा रहा है। मास्टर रोल में रोज वही नाम, वही फोटो और वही कार्य विवरण दर्ज होता है। संख्या घटाकर यह दिखाने की कोशिश जरूर की जाती है कि सब कुछ नियम के अनुसार चल रहा है, लेकिन असलियत यह है कि पूरा खेल केवल आंकड़ों तक सीमित है। फोटो और जियो टैगिंग जैसी व्यवस्थाएं, जिन्हें भ्रष्टाचार रोकने के लिए हथियार बताया गया था, अब खुद भ्रष्टाचार की ढाल बनती दिख रही हैं। एक ही पृष्ठभूमि, एक ही समूह और एक ही मुद्रा अलग-अलग तारीखों पर अपलोड की जा रही है। यह तभी सम्भव है जब निगरानी केवल कागजों तक सीमित हो और जमीन पर सत्यापन जानबूझकर न किया जा रहा हो। जनपद में मनरेगा की निगरानी डीसी मनरेगा के पास है। इसके बावजूद यदि एक ही मॉडल बार-बार सामने आता है और कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह निष्क्रियता नहीं बल्कि व्यवस्था के भीतर संरक्षण की ओर इशारा करती है। सवाल उठता है कि क्या जिले स्तर पर जान-बूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं? गडरखा जिस विकास खण्ड में आता है, वहां के खण्ड विकास अधिकारी की भूमिका सबसे अधिक सन्देह के घेरे में है। कार्यस्थल, मजदूरों की उपस्थिति और मास्टर रोल का मिलान करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके बावजूद अगर मिलान करना उनकी जिम्मेदारी है। इसके बावजूद अगर कागजों में सैकड़ों मजदूर हैं और जमीन पर सन्नाटा है, तो यह लापरवाही नहीं बल्कि जिम्मेदारी से भागने का मामला है।मनरेगा लोकपाल की व्यवस्था अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिए बनाई गई थी, लेकिन जिले में यह व्यवस्था लगभग अदृश्य नजर आती है। न तो स्वतन्त्र भौतिक सत्यापन, न मजदूरों से संवाद और न ही सार्वजनिक रिपोर्ट उपलब्ध हैं। इससे सवाल उठता है कि क्या लोकपाल की भूमिका केवल कागजों तक सीमित कर दी गई या जान-बूझकर निष्क्रिय रखी गई है। वहीं सूत्रों और ग्रामीणों के मुताबिक गडरखा जैसा मॉडल जिले के कई अन्य गांवों में भी अपनाया जा रहा है। तय मजदूर, तय फोटो और तय मास्टर रोल यह ऐसा ढांचा बन गया है जो पूरे सिद्धार्थनगर में धड़ल्ले से चल रहा है। कहीं संख्या 100 से ऊपर है, तो कहीं नाम पुराने हैं, लेकिन तरीका एक ही है। मनरेगा, जो ग्रामीणों के सम्मान और रोजगार से जुड़ी योजना है, अब आंकड़ों और भुगतान की मशीन बनती जा रही है। यदि समय रहते डीसी मनरेगा, खण्ड विकास अधिकारी बढ़नी और मनरेगा लोकपाल की जवाबदेही तय नहीं हुई, तो यह साफ हो जायेगा कि जिले में मनरेगा भ्रष्टाचार अपवाद नहीं बल्कि व्यवस्था बन चुका है। यही सवाल केवल गडरखा का नहीं है बल्कि सवाल यह है कि सिद्धार्थनगर में मनरेगा किसके लिए चल रही है, मजदूरों के लिए या फर्जी मास्टर रोल के लिए। रिकॉर्ड बोल रहे हैं, लेकिन जमीन अब भी खामोश है।

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