आशा बहुओं का 9 सूत्रीय मांगों को लेकर विरोध प्रदर्शन, डीएम को दिया ज्ञापन

सिद्धार्थनगर। जनपद सिद्धार्थनगर के कलेक्ट्रेट परिसर में गुरुवार को सैकड़ों आशा बहुओं ने अपनी मांगों को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय में जोरदार प्रदर्शन किया। आशा बहू आशा संगिनी स्वास्थ्य कार्यकत्री वेलफेयर एसोसिएशन के बैनर तले एकत्रित आशा कार्यकर्ताओं ने धरना दिया। आशा बहुओं ने कलेक्ट्रेट परिसर में नारेबाजी के साथ कहा कि हम आशा नहीं अब अधिकार हैं व सेवा का सम्मान चाहिए। वहीं ऐसे नारों से जिलाधिकारी कार्यालय गूंज उठा। कलेक्ट्रेट परिसर में सैकड़ों की संख्या में जुटीं आशा बहुओं ने अपनी 9 सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदर्शन किया। वहीं धरनास्थल पर महिलाएं हाथों में तख्तियां लिए खड़ी थीं। उन्होंने चेतावनी दी कि मांगें नहीं मानी गईं तो आन्दोलन और उग्र होगा। आशा बहू-आशा संगिनी स्वास्थ्य कार्यकत्री वेलफेयर एसोसिएशन की पदाधिकारियों ने आन्दोलन का नेतृत्व राज्य कर्मचारी संरक्षण मंच के जिलाध्यक्ष अनिल सिंह ने किया। आशा बहुओं द्वारा उनकी मांगों में मार्च 2025 की प्रोत्साहन राशि का तत्काल भुगतान हो। आभा कार्ड (।ठभ्।) बनाने की राशि अब तक नहीं मिली, वह तुरन्त दी जायें। राज्य वित्त आयोग से मिलने वाली ₹1500 प्रतिमाह की राशि पिछले 3 माह से लम्बित है, उसका भुगतान हो। जननी सुरक्षा योजना की ₹600 की प्रोत्साहन राशि तीन साल से नहीं मिली, वह तत्काल दी जायें। आशाओं को स्थायी कर्मचारी का दर्जा मिले, ईपीएफ, पेंशन, बीमा और अन्य सुरक्षा लाभ दिये जायें। भुगतान की प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध हो। आशा संगिनियों के साथ समान व्यवहार किया जायें। आशा सर्वे, पोषण ट्रैकिंग जैसे डिजिटल कार्यों के लिए अतिरिक्त मानदेय मिले। गर्भवती और शिशु मृत्यु दर रिपोर्टिंग पर अलग से प्रोत्साहन मिले। धरने में शामिल विनीत मिश्रा (कार्यवाहक अध्यक्ष), संगीता यादव, इन्द्रावती चौधरी, रिंकी वर्मा, शशिप्रभा गीरी, राजमती, छाया त्रिपाठी, सन्तोष शर्मा जैसी प्रमुख आशाओं ने कहा कि हमने महामारी (कोरोना) के समय में घर-घर जाकर लोगों की जान बचाई। अब सरकार से सिर्फ इतना चाहते हैं कि वह हमें कर्मचारी का दर्जा देकर हमारी मेहनत का सम्मान करें। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ मानदेय की नहीं, इज्जत की लड़ाई है। आशाओं ने दो टूक कहा कि यदि 15 दिनों के भीतर कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती, तो वे जनपद से लखनऊ तक आन्दोलन का बिगुल बजा देंगी। हम अब सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की श्आशाश् नहीं हैं बल्कि हम अपने अधिकारों की लड़ाई में फ्रंटलाइन फाइटर हैं।




