
शिव जी ने लोकमंगल की भावना से सृष्टि को रचा
भगवान शिव ने ब्रह्मांड की संरचना की। शिव शब्द का अर्थ शुभ, स्वाभिमान से युक्त, अनुग्रहशील, सौम्य, दयालु, उदार और मैत्रीपूर्ण होता है। लोक व्युत्पत्ति में शिव की जड़ शि है जिसका अर्थ है जिसमें समस्त वस्तुएं व्यापक रूप से समाविष्ट हैं और ष्वाष् इसका अर्थ है अनुग्रह के अवतारा। जबकि शिवत्व लोकमंगल की व्यापक चेतना है।
शिवत्व का अर्थ है, भगवान शिव की तरह होना या शिव के स्वरूप में समा जाना है। एक तरह से शिवत्व, प्रकृति में संतुलन बनाए रखने का भाव भी है। शिवत्व को प्राप्त करने के लिए चर्या, क्रिया, योग, और ज्ञान जैसे मार्ग अपनाए जाते हैं। शिवत्व का अभिप्राय मंगलकारी या कल्याणकारी भाव के होने से है।
शिवत्व का अभिप्राय अमरता से भी है यानी कि प्रत्येक युग और काल में जीवित रहने से भी है।
शिवत्व का अभिप्राय लोक मंगल की वह विराट और उदात्त भावना जिसमें अन्य के कष्टों को हरने का प्रयास किया जाता है। शिवत्व का अभिप्राय समग्र रूप से जन मंगलकामना से भी है।
भगवान शिव को पुरुष (ऊर्जा) और प्रकृति का उदात्त स्वरूप का पर्याय माना गया है। भगवान शिव परस्पर विरोधी शक्तियों के बीच सामंजस्य बनाए रखने के प्रतीक हैं। कह सकते हैं कि उनमें विरुद्धों के सामंजस्य का भाव अंतर्निहित है।
शिवत्व की प्राप्ति के लिए चर्या, क्रिया, योग, और ज्ञान जैसे मार्गों की साधना की जाती है। शिवत्व की प्राप्ति के लिए तपस्विता साधक का अनिवार्य गुण है।
लेखक विनय कांत मिश्र/दैनिक बुद्ध का संदेश




