फसल अवशेष प्रबंधन पर ब्लॉक स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम आयोजित

भनवापुर/सिद्धार्थनगर। कृषि विज्ञान केंद्र सोहना, सिद्धार्थनगर द्वारा ब्लॉक इटवा में फसल अवशेष प्रबंधन पर ब्लॉक स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में किसानों को फसल अवशेष जलाने से होने वाले दुष्प्रभाव एवं अवशेष प्रबंधन के लाभों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की गई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप कुमार ने बताया कि फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, मृदा में उपस्थित सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, पोषक तत्वों की हानि होती है, मिट्टी की सतह कठोर हो जाती है तथा मृदा रंध्रों में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है, जिससे भूमि की जल धारण क्षमता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन अपनाने से मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है, सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है तथा मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होता है। इस दौरान बीज वैज्ञानिक डॉ. सर्वजीत ने गेहूं बीज उपचार के लिए टेबूकोनाजोल 35 मिली प्रति 100 किलो बीज की मात्रा से उपचार करने की सलाह दी। साथ ही कीट नियंत्रण हेतु क्लोरोपायरीफॉस 20ः ईसी 4 मिली प्रति किलो बीज प्रयोग करने की जानकारी दी।केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार ने बताया कि यदि किसान फसल अवशेष को खेत में ही सड़ाते हैं, तो मृदा में कार्बनिक पदार्थ बढ़ता है, मिट्टी का तापमान नियंत्रित रहता है तथा बीज अंकुरण के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त होने से पौधों की संख्या एवं उत्पादन दोनों बढ़ते हैं। वहीं उद्यान वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र ने फसल अवशेष प्रबंधन हेतु उपयोगी कृषि यंत्रों जैसेकृरोटावेटर, स्ट्रॉ चॉपर, सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, स्ट्रॉ बेलर आदि के लाभों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद अवशेषों पर यूरिया का छिड़काव या डीकंपोजर के उपयोग से अवशेष आसानी से सड़ते हैं, जिससे मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक दशा में सुधार होता है तथा सब्जियों के जैविक उत्पादन में सहायता मिलती है। कार्यक्रम में राम प्रकाश शुक्ल, सत्येंद्र कुमार, अफरोज खान, कलीमुल्ला, सुरेंद्र, राम अजोर सहित क्षेत्र के अनेक किसान उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन कृषि विज्ञान केंद्र की टीम द्वारा किया गया।




