करोड़ों खर्च करने ने के बाद भी जिले में कागजों में सिमटा एफपीओ गठन

सिद्धार्थनगर। प्रधानमंत्री किसान समृद्धि और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के लिए एफपीओ (फार्मर प्रोड्यूसर अर्गनाइजेशन) योजना लाई गई थी। इसका मकसद था किसानों को संगठित कर समूह के रूप में खडा करना, उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाना और उन्हें सीधी बाजार से जोडना था, लेकिन जिले में यह योजना भ्रष्टाचार का अड्डा बनकर रह गई। कई करोड रुपये का भुगतान सरकारी खाते से निकल चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिले में एक भी सक्रिय एफपीओ दिखाई नहीं दे रहा है। किसानों से धोखा, एफपीओ सिर्फ कागजों में जिन किसानों को इस योजना का लाभ मिलना था, वे आज भी अंजान हैं। गांवों में न तो कोई किसान समूह गठित हुआ, न मीटिंग बुलाई गई और न ही किसी को एफपीओ की गतिविधियों की जानकारी दी गई। किसानों का कहना है कि उनके नाम पर संगठन बना दिए गये, पैसे भी निकल गये, लेकिन उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। इस घोटाले में सबसे बड़ा सवाल है जब करोडों रुपये एफपीओ के नाम पर जारी हुए तो उसकी मनिटरिंग किसने की? कृषि विभाग जिला उद्यान विभाग सहकारिता विभाग सभी के अधिकारी इस योजना से सीधे जुडे हुए हैं। लेकिन न किसी ने निरीक्षण किया, न गांवों में जाकर सच्चाई जानी। अब आमजन पूछ रहे हैं कि क्या यह मिलीभगत का मामला है? सूत्रों की मानें तो जिले में दर्जनों एफपीओ स्वीकृत किये गये थे। हर एफपीओ को लाखों-करोडों की फंडिंग हुई। योजना के तहत ट्रैनिंग, दफ्तर, बैंक खाता और किसानों के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था होनी चाहिए थी। लेकिन धरातल पर न दफ्तर दिखायी दे रहे और न ही किसान समूह, सिर्फ फाइलों में एन्ट्री भर हो गई। स्थानीय जनता और किसान संगठनों ने अब यह मांग उठाया है कि इस पूरे प्रकरण की सीबीआई या ईडी से उच्चस्तरीय जांच कराई जाये। ताकि यह साफ हो सकें कि किसानों के नाम पर आया करोडों रुपये आखिर किसकी जेब में चला गया। जिले के लोग अब जिला अधिकारी और शासन से सीधी कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं। सवाल साफ है कि क्या जिले में किसानों का हक लूटा गया? क्या अधिकारी और नेताओं की मिलीभगत से करोडों रुपये हडपे गये? क्या दोषियों को सजा मिलेगी या मामला दबा दिया जायेगा?




