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बेटी दिवस पर बिशेष, सोनभद्र

बेटी दिवस पर विशेष: बेटियों को समझना बड़ी बात : बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी । बेटी दिवस की पूर्व संध्या पर बेटियों को अभूतपूर्व संदेश देते हुए बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी ने शनिवार को इस संवाददाता से एक विशेष भेंटवार्ता में कहा है कि 25 सितंबर रविवार को देश में बेटी दिवस मनाया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि खास तौर पर यह दिन बेटियों के लिए समर्पित रहेगा। बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी की माने तो इस खास दिवस को वैसे तो अलग-अलग देशों में अलग-अलग दिन मनाया जाता है,लेकिन भारत में इसे हर वर्ष सितंबर महीने के चौथे रविवार को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने के संदर्भ में उनका कहना है कि बेटियों को प्यार जताने के उद्देश्य से बेटी दिवस मनाया जाता है। भारत में बेटी दिवस मनाने की वजह लोगों को बेटियों के प्रति देश काल और समाज की संरचना करने की जिजिप्सा जागृत करना है। उन्होंने आगे बताया कि बेटी को जन्म से पहले मारना, उसे पढ़ने-लिखने ना देना, घरेलू हिंसा, दुष्कर्म जैसे कुरूतियों से बाहर निकलने के लिए उत्प्रेरित करने और जागरुक करने के लिए ही इस दिवस को मनाया जाता है। इसे और स्पष्ट करते हुऐ बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी कहती हैं कि बेटी दिवस यही समझाता है कि बेटियां बोझ नहीं होती, बल्कि आपके घर का एक अहम हिस्सा होती हैं। ऐसे में विचारणीय तथ्य यह है कि क्या वास्तव में एक दिन बेटी दिवस के रूप में मना कर, उनके लिए शायरी, कविता लिख कर, उनके साथ फोटो लगा कर, उनके लिए अच्छा सा उपहार ला कर हम अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए! हमारी सोच बेटियों के विषय मे भी अपने - पराये पर आ कर रुक जाती है कि हमारी है तो सुरक्षित रहे पर दूसरे की है तो उसकी सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी नहीं है। बाल व्यास का मानना है कि हम ये जिस दिन से सोच लें कि यदि कोई बच्ची कभी भी कहीं भी अकेले है चाहे वो किसी की भी हो, तो उस बच्ची की सुरक्षा संरक्षा करना हम सबकी पूरे समाज की जिम्मेदारी है। हम सभी उसे सकुशल उसके गन्तव्य तक पहुँचा कर कम से कम स्वयं की दृष्टि में ही अच्छे बने रहें। आगे वह यह भी कहती हैं कि हमारे इसी समाज मे जहां आज बेटी दिवस मनाया जा रहा है और कहा जा रहा है कि "मेरी बेटी मेरा अभिमान" "बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ" वहीं दूसरी तरफ समाज में कितनी गंदी सोच रखने वाले लोग भी हैं जिनके कारण 4 से 5 माह की बच्ची भी आज सुरक्षित नहीं है। बाल व्यास आराधना चतुर्वेदी ने कहा कि एक तरफ किसी बेटी का विवाह हो रहा है तो ससुराल वाले कहते मिलेंगे की हम बहू नहीं बेटी ले कर जा रहे हैं परंतु क्या वास्तव में ऐसा होता है? जवाब आपके स्वयं के पास है शायद। हम ये नहीं कहते कि हर व्यक्ति की यही सोच है कहीं कहीं हमारी भी बेटी की गलती हो सकती है क्योंकि शायद जीवन की इस भाग - दौड़ में हमने उन्हें संस्कार व सभ्यता सिखाई है। बावजूद इसके पूर्ण रूपेण वह उन संस्कारों व हमारी मान मर्यादाओं के अनुरूप स्वयं को न ढाल पाई हो तो हमारा कर्तव्य तब भी बनता है कि हम उसे आराम से समझा कर उसका जीवन सवारें न कि उसके घर मे दखलंदाजी करें। अंत में वह क्या कह कर अपनी भावना को प्रदर्शित करती हैं कि फिर कभी समयानुसार इस विषय पर विस्तार से बात होगी अभी तो मात्र इतना ही कहना चाहेंगे कि बेटी दिवस मनाना बहुत अच्छी बात है परंतु बेटियों को समझना बड़ी बात है।

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