सांसद जगदम्बिका पाल ने लोकसभा सदन में नियम 377 के तहत पिपरहवा अवशेष रत्नों का उठाया मुद्दा

बढ़नी/सिद्धार्थनगर। लोकसभा सदन में लोकप्रिय सांसद जगदम्बिका पाल ने नियम 377 के तहत भगवान बुद्ध से जुड़े पिपरहवा अवशेष रत्नों के विषय को उठाया। जिसमें पिपरहवा उ0प्र0 के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित प्राचीन कपिलवस्तु की पहचान से जुड़ा हुआ स्थल है। जहां भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के प्रारम्भिक 29 वर्ष बिताये थे। वर्ष 1898 में ब्रिटिश इंजीनियर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे द्वारा की गई खुदाई में यहां से 300 से अधिक पवित्र रत्न धातुयें प्राप्त हुई थीं। ये अवशेष भगवान बुद्ध के अनुयायियों द्वारा तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व में अर्पित किये गये माने जाते हैं और भारतीय पुरातत्त्व इतिहास की एक महान खोज हैं। मई 2025 में यह अमूल्य धरोहर हांगकांग स्थित विश्वप्रसिद्ध नीलामी संस्था ‘ैवजीमइल’े’ में नीलामी हेतु सूचीबद्ध कर दी गई थी। इस संवेदनशील क्षण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत सरकार और संस्कृति मंत्रालय ने निर्णायक पहल की। समय पर हस्तक्षेप करते हुए न केवल नीलामी को रुकवाया गया बल्कि इन पवित्र अवशेष रत्नों को सफलतापूर्वक भारत वापस लाया गया। यह सांस्कृतिक धरोहरों की पुनर्प्राप्ति में भारत सरकार की एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। वर्तमान में ये अवशेष राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में संरक्षित हैं। वहीं सांसद जगदम्बिका पाल ने सरकार से आग्रह किया कि इन्हें उनके मूल स्थल सिद्धार्थनगर स्थित कपिलवस्तु संग्रहालय में स्थापित किया जाये। उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल ऐतिहासिक न्याय होगा, बल्कि श्रद्धालुओं को गहरा आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करेगा, बौद्ध परिपथ एवं धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा और क्षेत्रीय विकास में भी सहायक सिद्ध होगा। यह हस्तक्षेप भारत की उस प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसके अन्तर्गत हम अपनी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को पुनः प्राप्त कर गर्व से उनका संरक्षण कर रहे हैं।




