जनप्रतिनिधियों के शिकायत के बाद भी कैसे 16 वर्षों से अंगद के पांव की तरह जमे रहे कर्मचारी, करते रहे काम

सिद्धार्थनगर। 16.50 करोड़ 16.50 करोड़ 16.50 करोड़ धान क्रय केंद्र का घोटाला लोगों को जीने नहीं दे रहा है लेकिन बारीकियां से अगर इस पर अध्ययन किया जाए तो यह पटकथा 16 वर्षों से ही लिखी जा रही थी पीसीएफ सिद्धार्थनगर के कार्यालय में कुछ कर्मचारी 16 वर्षों से अंगद के पांव की तरह पैर जमाये कार्य करते रहे जबकि उनका विरोध कई जन प्रतिनिधियों ने भी प्रबंधक निदेशक पीसीएफ लखनऊ को शिकायत किया था लेकिन उस पर किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गई थी आपको बता दें कि जनपद के एक वरिष्ठ जनप्रतिनिधि ने प्रबंध निदेशक पीसीएफ लखनऊ को 30/01/2025 को पत्र लिखकर कर्मचारियों की शिकायत करते हुए कहा था कि जनपद सिद्धार्थनगर में कार्यरत दो कर्मचारी विगत 16 वर्षों से सिद्धार्थनगर में जमे हुए हैं और जब मैं जनता के बीच जाता हूं तो जनता से अनेक शिकायतें उनके खिलाफ मिलती है जनप्रतिनिधि ने यह भी कहा कि कई वर्षों से धान खरीद में गड़बड़ी कहीं ना कहीं इन्हीं के द्वारा किया जा रहा है यह अपने ट्रकों से माल ढुलाई का कार्य भी करते हैं इनके पास आय से अधिक अर्जित संपत्ति है साथ ही अपने आप को बहुजन समाज पार्टी का कार्यकर्ता बताते हैं और निरंतर उत्तर प्रदेश व भारत सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को अनुउपयोगी बताते रहते है और सरकार की आलोचना भी करते हैं जनप्रतिनिधि ने शिकायत करते हुए प्रबंध निदेशक से आग्रह किया था कि इन दोनों कर्मियों का स्थानांतरण तत्काल कहीं और करवा दें और उनके भ्रष्टाचार की जांच कर कर उनके खिलाफ कार्रवाई करें लेकिन प्रबन्ध निदेशक पीसीएस लखनऊ ने भी इनका स्थानांतरण नहीं किया ना ही इनके ऊपर कोई कार्रवाई की गई थी जब मामला अधिक बढ़ने लगा और 16.50 करोड़ का जिन्न बाहर निकलने लगा तो कुछ कर्मचारियों के ऊपर मुकदमा दर्ज कर कोरम पूरा कर दिया गया कहीं ना कहीं 16.50 करोड रुपए के धान क्रय केंद्र में विभागीय मिली भगत बड़े पैमाने पर हुई है या फिर कहें सिद्धार्थनगर से लेकर बस्ती लखनऊ तक एक दूसरे से अधिकारी तालमेल बैठाकर कार्य करते रहे हैं अब जबकि मामला सीबीसीआईडी के पाले में गया है और सीबीसीआईडी द्वारा जांच की जा रही है तो लोगों का मानना है कि जल्दी ही 16.50 करोड़ के भुगतान का असलियत सबके सामने आ जाएगा कि आखिर इसमें ठेकेदार शामिल थे या विभागीय कर्मचारियों द्वारा ही किया गया था सूत्रों की माने तो कुछ कर्मचारियों ने यह भी कहा है कि विभाग को यह सारी जानकारी थी लेकिन मामले में आपसी तालमेल न बैठने के नाते उजागर हुआ वैसे देखने वाली बात एक और है कि जहां जांच 23-24 की हो रही है तो वहीं 24-25 की भी जांच क्यों नहीं की जा रही है इस पर भी विचार करने वाली बात है।
जिनके पास रकबा ही नहीं था वह भी बेचे धान, धन्य है सत्यापन अधिकारी
सिद्धार्थनगर। जनपद में 16.50 करोड़ के धान क्रय केंद्र में नए-नए खुलासे प्रतिदिन होते आ रहे हैं जहां 23 किसानों ने धान क्रयकेन्द्रों पर अपना धान बेचा था तो वही कुछ किसान ऐसे भी हैं जिनका रखबा ही नहीं था उनकी खतौनी की भी जाँच हो रही है। अब सवाल यह उठता है कि इन 23 किसानों ने जो 63 बार धान बेचा था उसका सत्यापन किसने किया था, क्या सहकारिता सचिवों की भूमिका या फिर सत्यापन करने वालों की भूमिका संदिग्ध नहीं है इस पर जांच होना जरूरी नजर आता है। जांच टीम ने जब जांच किया तो उन्हें ऐसे ग्राम पंचायत को चिन्हित किया जिनमें तीन से चार टोले थे और वहां के किसानों के नाम का सत्यापन कर दिया गया।किसान का नाम और खतौनी के सत्यापन में तहसील स्तर पर एसडीएम पुष्टि करते हैं और उसका सत्यापन एडीएम के नेतृत्व में होता है लेकिन जब जांच टीम ने जांच किया तो पाया कि सहकारिता के एक कर्मचारी की भूमिका संदिग्ध है वह सत्यापन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था इसी कर्मचारियों ने 37 क्रय केंद्र बनाने का प्रस्ताव भेजा था और इसी कर्मचारियों को जिम्मेदारी थी कि सप्ताह में 1 दिन क्रय केंद्रों का निरीक्षण कर उसका सत्यापन करेगी आखिर किस प्रकार का सत्यापन कर्मचारियों ने किया था इसकी जांच सीबीसीआईडी की जांच में खुलकर सामने आ सकता है शुरू से ही जन चर्चा में व्याप्त है कि कार्यालय के कर्मचारियों की लापरवाही या मेल मिलाप का नतीजाधान क्रय केंद्र घोटाला हो सकता है।




