मनुष्य के अन्दर मौजूद आसुरी प्रवृत्तियों को दमन करने के लिए सत्संग जरूरी है: आचार्य हरिवेंद्र त्रिपाठी

बांसी। पथरा बाजार क्षेत्र के कम्हरिया में श्रीमद् भागवत कथा शुभारंभ के प्रथम दिवस कथा व्यास आचार्य हरिवेन्द्र त्रिपाठी ने बताया कि चारों युगों में देवता और दैत्यों का प्रभाव रहा, सतयुग में देवता और दैत्य थे लेकिन दोनों के रहने के लिए अलग-अलग लोक था देवता देवलोक में रहते थे और दैत्य पाताल लोक में त्रेता युग में भी देवता देते थे लेकिन उनके लिए अलग-अलग लोक नहीं था बल्कि राज्य अलग-अलग था श्री राम अयोध्या में थे और रावण लंका में था द्वापर में भी देवता और देते थे लेकिन इनका राज्य अलग-अलग नहीं था एक ही राज्य में एक ही घर में देवता देते दोनों रहते थे जय श्री कृष्ण और कंस और जब से कलयुग लगा है कलयुग में भी देवता और दैत्य हैं लेकिन यह अलग-अलग घर में नहीं बल्कि एक ही व्यक्ति के अंदर रहते हैं एक मनुष्य के भीतर दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों का प्रभाव बना रहता है ऐसी स्थिति में अंतःकरण में बैठे आसुरी शक्तियों के प्रभाव से बचने के लिए सत्संग की अत्यंत आवश्यकता है। आचार्य ने बताया कि श्रीमद् भागवत महापुराण की कथा श्रवण करने से भक्ति ज्ञान और वैराग्य दृढ हो जाता है और अंतःकरण में बैठे आसुरी शक्तियों का दमन हो जाता है। उक्त अवसर पर दिलीप कुमार, राजेश सिंह और रिंकू सिंह आदि सहित तमाम लोग उपस्थित रहे।




