मर्यादा के साथ संस्कारयुक्त जीवन से होगी प्रभु की प्राप्तिरू सर्वेश्वर

बस्ती। कई जन्मों के सत्कर्म के बाद मानव शरीर प्राप्त होता है। जब मानव शरीर प्राप्त होता है तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह होती है कि हम जीवन में मर्यादा, धर्म, दान पुण्य का पालन करते हुए परोपकार और सदकर्म में समय व्यतीत करें। पृथ्वी पर कोई ऐसा जीव नहीं है जिसके जीवन में चुनौतियां नहीं है, लेकिन मानव अपने सहज और निर्मल स्वभाव से धर्म के अनुकूल आचरण करते हुए लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। आज युवा पीढ़ी में तमाम ऐसी समस्याएं देखने को मिल रही हैं जिसके पीछे एक बड़ा कारण संस्कार की कमी प्रतीत होती है। संस्कार की कमी के कारण आज अधिकांश युवा पीढ़ी भ्रम और संशय की स्थिति में है। यह सद्वचन प्रकट किया सदर तहसील क्षेत्र के चननी गांव में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में व्यासपीठ पंडित सर्वेश्वर दत्त त्रिपाठी ने। उन्होंने कहा कि संस्कार से जीवन का निर्माण होता है। जीव स्वतंत्र नहीं होता है। वह मर्यादा की परिधि में सीमित है। बिना संस्कार के कोई जीव मर्यादा में नहीं रह सकता। मर्यादा और संस्कार से मानव जीवन में वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है जो इच्छा वह रखता है। संस्कार युक्त जीव का आचरण मर्यादा में सीमित रहता है। जब मानव ऐसा व्यवहार करता है तो वह आरोग्य और धर्म अनुरागी होता है। संस्कार से संयम और संयम से मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में भी स्वयं को सहज रखकर परमात्मा की ओर अग्रसर होता है। श्रीमद् भागवत कथा श्रवण मात्र से मानव अपने सभी जन्मों के पाप से मुक्त हो सकता है। राजा परीक्षित की मृत्यु निश्चित थी लेकिन सप्त दिवस कथा श्रवण मात्र से ही उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। कथा का समापन प्रसाद वितरण और भंडारे के साथ हुआ। इस दौरान प्रमुख रूप से रमेश मिश्र, गिरिजेश मिश्र, हरिश्चंद्र मिश्र, नितेश शर्मा, विपिन कुमार, श्रद्धा, पूनम, ज्ञानमती, सुरेश, अभिनव सहित अन्य श्रोता मौजूद रहे।




