हल्लौर में मोहर्रम की दसवीं पर परम्परागत ढंग से निकाला गया अलम, ताबूत और जुलजनाह का जुलूस
नौहां-मातम कर हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत को किया याद।

डुमरियागंज/सिद्धार्थनगर। तहसील क्षेत्र डुमरियागंज के शिया बाहुल्य कस्बा हल्लौर में 9 मोहर्रम की रात्रि में इमाम बारगाह वक्फ शाह आलमगीर सानी में बड़े ताजिया चौक पर रखे गये। अज़ादारों ने कफनी पहनकर ताजिया का तवाफ (परिक्रमा) कर इमाम हुसैन अस को याद कर नियाज़ फातिहा दिलाया गया। आखरी नबी हजरत मोहम्मद मुस्तफा के प्यारे नवासे हजरत इमाम हुसैन की अजीम कुर्बानी की याद में इमाम बारगाह और हर घर में ताजिया रखकर नियाज़ फातिहा दिलाया गया और मरसिया मजलिस आयोजित कर नौहां-मातम मातम किया गया। जगह-जगह हजरत इमाम हुसैन की याद मे सबील लगाईं गई। सन 61 हिजरी में यज़ीद जैसा क्रूर शासक तख़्त पर बैठा, जो क्रूर होने के साथ-साथ बेहया बेशर्म भी था। वह इमाम हुसैन से बैययत लेना चाहता था, लेकिन इमाम हुसैन ने उसकी बय्यत से इनकार कर दिया। यजीद इमाम हुसैन के नाना के दीने इस्लाम में बदलाव लाना चाहता था। तब्दीलिया कर रहा था इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में उसके चेहरे से नकाब उतारकर फेंक दिया और जमाने को बता दिया कि हक के लिए सर कटा देना ही बेहतर है, जिल्लत की जिन्दगी से इज्जत की मौत बेहतर है। उन्होंने इंसानियत को पैगाम दिया कि किस तरह से सर उठाकर जियो, हमेशा जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाया करो, बातिल का साथ मत दो और जुल्म के खिलाफ खड़े हो जाया करो। इमाम हुसैन ने कर्बला से अमन और शान्ति का पैगाम दिया 10वीं मोहर्रम जिसे रोज़े आशूरा कहा जाता है। इमाम हुसैन का घर बार इस दिन उजड़ गया। इमाम हुसैन 72 साथियों के साथ शहीद कर दिये गयें, जिसमें बराबर के बहादुर जाबांज भाई, जवान बेटा, भांजे भतीजे असहाब और अंसार शामिल थे। उसी में इमाम हुसैन का दूध पीता हुआ 6 माह का मासूम बच्चा था। जब इमाम हुसैन कर्बला के मैदान में अकेले रह गये तो उन्होंने सदा दीं कि है कोई जो मेरी मदद को आये। बच्चे ने आवाज सुनकर अपने आप को झूले से गिरा दिया। इमाम हुसैन अली असगर को मैदान में लाकर पानी मांगा। कहा कि अगर तुम्हारी नजर में मैं खताकार हूं, तो इस बच्चे की क्या खता है। इस बच्चे को पानी दे दो। लेकिन जालिमों ने पानी के बदले तीन फाल के तीर से बच्चे को शहीद कर दिया। इतनी अजीम कुर्बानी जो कोई भुला नहीं सकता। शायरों ने क्या खूब कहा है ष्इंसान को बेदार तो हो लेने दो। हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन। हिन्दू, मुस्लिम एकता का प्रतीक यह मोहर्रम सदियों से मनाया जा रहा है। यहां पर हिन्दू और मुस्लिम सभी समुदाय के लोग आते हैं और ताजिया का बोसा लेते हैं और नजर और फातिहा कर इमाम हुसैन को याद करते है। जिनमें कई गांवों के लोग शामिल होते है। सुबह नमाज के बाद आग का मातम होता है। आग पर चलकर या हुसैन या हुसैन की सदाएं बुलन्द होती हैं। इसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग आते हैं। मातम के बाद मजलिस हुईं, फिर जुलूस बरामद हुआ जो पुरे कस्बे से होता हुआ मेन रोड पहुंचा। जहां पर मातम हुआ और लोगों ने या हुसैन या हुसैन की सदाएं बुलन्द की और लोगो ने काफी संख्या मे ज़नजीर कमा का मातम किया। उसके बाद मातमी जुलूस इमाम बारगाह वक्फ शाह आलमगीर सानी में खत्म हुआ। उसके बाद जुलूस 3रू00 बजे बड़े ताजिया के साथ करबला पहुंचा और कर्बला में ताजिया दफन किये गये पुलिस प्रशासन पूरी तरह से काफी मुस्तैद रहा।




