सांसद पाल ने सदन में अतारान्कित प्रश्न के माध्यम से उठाया महत्वपूर्ण मुद्दा

दैनिक बुद्ध का संदेश
सिद्धार्थनगर।लोकसभा में डुमरियागंज से सांसद जगदम्बिका पाल ने मंगलवार को वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय से भारत-यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ हुए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते से सम्बन्धित अतारान्कित प्रश्न के माध्यम से महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। श्री पाल ने सरकार से यह जानना चाहा कि 1 अक्टूबर 2025 से लागू हुए इस समझौते से भारत को क्या प्रमुख लाभ प्राप्त हो रहे हैं, विशेष रूप से अगले 15 वर्षों में 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार सृजन की प्रतिबद्धता के सन्दर्भ में। उन्होंने यह भी पूछा कि किन-किन क्षेत्रों-जैसे वस्त्र, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन, प्रसंस्कृत खाद्य, चावल, समुद्री उत्पाद तथा आईटी एवं पेशेवर सेवाओं को इस समझौते से लाभ मिल रहा है और देशों द्वारा दिये गये टैरिफ रियायतों का क्या दायरा है। इसके अतिरिक्त, श्री पाल ने विशेष रूप से यह मुद्दा उठाया कि क्या जीआई टैग वाले उत्पाद, जैसे काला नमक चावल, को इस समझौते के तहत शुल्क में छूट या शुल्क-मुक्त बाजार पहुंच का लाभ मिलेगा। उन्होंने सरकार से यह भी जानकारी मांगी कि ऐसे पारम्परिक और विशिष्ट भारतीय उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने तथा उनके बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अपने उत्तर में वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री ने बताया कि (जिसमें स्विट्जरलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन शामिल हैं) के साथ यह समझौता भारत के लिए व्यापक आर्थिक अवसर लेकर आया है। इसके तहत 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश और 10 लाख रोजगार सृजन का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही, 92.2ः टैरिफ लाइनों पर रियायतों के माध्यम से भारतीय निर्यात को बेहतर बाजार पहुंच प्राप्त होगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि चावल सहित कई कृषि उत्पादों को टैरिफ रियायतें दी गई हैं, जिससे जीआई टैग वाले उत्पादों को भी म्थ्ज्। बाजारों में बेहतर अवसर मिलेंगे। समझौते में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों के संरक्षण तथा गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं। इसके अलावा, माध्यम से जीआई उत्पादों के प्रचार-प्रसार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। सांसद जगदम्बिका पाल द्वारा उठाया गया यह अतारांकित प्रश्न देश के किसानों, निर्यातकों और पारम्परिक उत्पादों के हितों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।




