किशोरावस्था में किशोरों को सच्ची सोच व सलाह की होती है जरुरत-सम्पादक सी.के.झा की कलम से।

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                         सम्पादकीय
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                  सम्पादक सी.के.झा की कलम से।

पटना:- किशोरावस्था जीवन का बड़ा ही नाजुक दौर होता है। किशोरावस्था रंग-बिरंगी ,सतरंगी व सुनहली कल्पनाओं से सजी-धजी आती है। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर जहां अल्हर बचपन छूटने को होता है वहीं यौवन की उमंगें छूने लगती है । उम्र की इस दहलीज पर शारीरिक विकास , सामर्थ्य एवं क्षमता पूरे शबाब पर होती है पर वैचारिक एवं बौद्धिक विकास के प्रारंभिक दौड़ में होती है । इस उम्र का हरेक कर्म भावी जीवन को प्रभावित करता है । इसलिए किशोरों को हर कदम सावधानीपूर्वक उठाना चाहिए। जिससे समस्याओं के अनेकों उलझनों में न फंसकर जीवनभर जिंदगी सुखमय बना रहेगा अन्यथा समस्याओं के  बहुफाश में फ‌ंसकर किशोरों को जीवनभर पश्चाताप के सिवाय और दूसरा रास्ता नहीं बच सकेगा। इस समय कच्चे और कमजोर मन:स्थिति अच्छे और बुरे के बीच के अंतर को भांप व माप नहीं पाती है । इसके कारण किशोरवय को नेक व अच्छी सलाह भी अपमानित करने जैसे महसूस करती है।

किशोरावस्था में अशिष्टता और उदंडता हावी हो जाती है जिसके बदले में हमेशा अपमान व तिरस्कार ही मिलता है । इस तरह धीरे-धीरे स्थिति बड़ी भयावह और विकराल रूप अख्तियार कर लेती है । देखा यह जाता है कि किशोरावस्था में किशोरवय मर्यादाओं की सीमाओं में मर्यादित रहना पसंद नहीं करता है । उच्छृंखलता की हर दिवार को तोड़ना अपनी शान और पराक्रम समझता है। आदतवश या अन्य कारणों से इस उम्र के दहलीज पर कुछ कर्म ऐसे हो जाते हैं जिन्हें न तो किशोरवय अन्य किसी से कह ही सकते अथवा मन में ही रख सकते ।
इस स्थिति में किशोरों के मन में कुछ प्रश्न ऐसे आते रहते जिसका उत्तर मिलना कठिन सा लगता है जो निम्न हैं :-
1) पहला प्रश्न यह उठता है कि मन की बात कहें तो किससे कहें ?
2) दूसरा प्रश्न पता नहीं अगला क्या सोचेगा ?
3) तीसरा प्रश्न सारी बातें कह देने पर हमारी बनी प्रतिष्ठा रेत महल की तरह हल्की हवा की झरोखों में ही  तरह ढ़ह ना जाय ?
4) चौथा प्रश्न हमको जानने समझने वाले लोग क्या कहेंगे ?
उपरोक्त सभी प्रश्नों को सोचते हुए किशोरवय अपनी समस्या बता पाने में सकुचाते हैं जो कि किशोरवय और अभिभावकों के लिए भविष्य में ग़लत साबित होता है । इस तरह किशोरों की बौद्धिक ,मानसिक और भावनात्मक क्षमताऐं विकसित होने की वजाय कुंद और कुंठित हो जाती है । ऐसी स्थिति आने से पहले ही अभिभावकों को अपने बच्चे के साथ मित्रवत बातें व व्यवहार से अपनी ओर आकर्षित कर लेनी चाहिए जिससे वो हर बात आपसे समय रहते शेयर कर सके । इसके लिए बच्चों को भी मित्र, भाई-बहन अथवा माता-पिता या अभिभावकों के साथ खुलकर बातचीत कर  ससमय इस तरह की किसी भी समस्या के समाधान करने को आगे आने की जरूरत होती है । किशोरवय अपने मित्रों व अभिभावकों को अपना सही मार्गदर्शक मानकर अपने अंत:मन के गलत-सही विचारों को ससमय रखकर या अपने मन को हल्का कर सकते हैं और समय रहते ग़लत रास्ते चुनने अथवा इसपर चलने से अपने को बचा  सकते हैं। इस तरह किशोरवय स्वयं एक अच्छी समझ अथवा पहल से आगे सुपथ पर बढ़ सकने का दंभ भर सकते हैं ।

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