गोष्ठियों एवं चर्चा में केन्द्र सरकार द्वारा किये गये 10 % सवर्ण आरक्षण ,संसदीय चुनाव के इर्द-गिर्द बुद्धिजीवियों को दिख रहा मोदी की जीत-दैनिक बुद्ध का संदेश संवाददाता के अनुसार

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एम0पी0 सिंह की एक रिपोर्ट
सिद्धार्थनगर- जनपद में बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों की मुख्य चर्चा का केन्द्र बिन्दु केन्द्र की मोदी सरकार द्वारा लिये जा रहे ताबड़तोड़ फैसले और आगामी संसदीय चुनाव में विपक्षियों के एकजुट गठबन्धन से उत्पन्न मोदी नेतृत्व विरोध और भविष्य की समीक्षा पर चर्चाओं का दौर लगातार जारी है बुद्धिजीवियों द्वारा जहां आर्थिक आधार पर 10 प्रतिशत आरक्षण को उत्तर प्रदेश लगायत भारत के लिये एक आभूतपूर्व फैसला माना वहीं यह भी चर्चा रही कि अल्पसंख्यक मुस्लिम जमात जमीनी धरातल और विकास से इतर केवल मोदी विरोध और धर्म से परे कोई भी राष्ट्रवादी सोच और प्रतिक्रिया नहीं रखना चाहता देश के धार्मिक बंटवारे के बाद सेकुलर आम एकल मतदाता प्रणाली संविधान द्वारा स्वीकृत किया गया, न्यायपालिका को स्वतंत्र किया गया, किन्तु अल्पसंख्यक जमात रामजन भूमि मसले पर कभी मुस्लिम जज न होने कभी कल्याण सिंह के भाजपा नेतृत्व के कार्यकाल का जज होने का मसला उठाकर जहां न्यायपालिका पर ही अविश्वास प्रकट करने की परिपाटी बनती दिख रही है,

वहीं एक-दो दिन में नये बेंच के गठन के वजाय मा0 उच्चतम न्यायालय द्वारा लम्बी तारीख नियत कर मामले को और भविष्य के गर्त में जाने दिया जा रहा है, पूरे भारत में बहुलक धर्मावलम्बियों की यह निर्विवाद रायसुमारी है, कि अयोध्या भगवान राम का जन्मस्थल है और आक्रमणकारी विदेशी आक्रांताओं के गुलामी और इस्लामीकरण में उक्त जन्मभूमि और मन्दिर के अस्तित्व को नकारा गया, जिसका निपटारा, वर्तमान सेकुलर संविधान में साक्ष्य के आधार पर किया जाना आवश्यक है, जिससे कि धार्मिक स्तर पर वोट की राजनीत न हो सके। और सभी राजनीतिक दलों को विकास के मुद्दों पर जनता के समक्ष अपने को बेहतर साबित करने का मार्ग प्रशस्त हो। बुद्धिजीवियों का यह भी कहना रहा, कि आज भारत के मिश्रित मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, दलित, हिन्दू नागरिकों के बीच विपरीत आस्था, विचार, सोंच और लोकतांत्रिक सिंगिल वोट सिस्टम में बहुलक मतदाताओं से चुनी सरकार को सभी को साथ लेकर चलना सभी को संतुष्ट करना और एक विधि से सम्पूर्ण विभिन्न मतावलम्बी जनता को कानून का सुशासन और विधि का शासन देना न केवल एक दुष्कर कार्य है, बल्कि एक कठिन चुनौती है, जहां काफी अर्से तक देश पर शासन करने वाली एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी बहुलक कम शिक्षित जनता के बीच केवल कुर्सी की लालच में अराजकता वाली भाषण शैली और लोक लुभावने वादो के जरिये न केवल कुर्सी पाने में सफल रही, वही बुद्धिजीवियों का चिंतन इस केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रित रहा कि अर्थव्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति की मजबूती को अनदेखी करते हुए कब तक धर्म और जाति पर तथा तुष्टीकरण पर राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति तथा राष्ट्र की मजबूती की अनदेखी की जाती रहेगी। जनता क्षणिक लोक लुभावने वादों और बहुलक धर्मान्ध समुदायों की एकजुटता से सत्ता बदल जाती है, किन्तु जनता यह कभी नहीं सोंचती कि भविष्यगत भारतीय सरकार वर्तमान बेरोजगारी, गरीबी भ्रष्टाचार तथा साम्यवादी देशों की साम्राज्य हड़पोनीति तथा विश्व के पूजीवादी विकसित चालाक ईसाई देशों द्वारा भारत सरीखे देशों का समुदायगत और धर्मगत तथा जातिगत आपसी वैमनष्य का लाभ उठाकर लगातार भारतीय अर्थ व्यवस्था का शोषण और भारतीय नागरिको को बदहाली में बनाये रखने की प्रवृत्त का खात्मा कैसे होगा, अब जबकि पिछले साढे चार वर्षो से राष्ट्र नायक और प्रबल दृढ़ संकल्पी नेता के रूप में नरेन्द्र दामोदर मोदी को राष्ट्र के चुनौतियों का सामना करने का मौका मिला तो क्यों न बहुलक जनता पुनः पांच वर्ष का मौका मोदी नेतृत्व को देकर राष्ट्र को शसख्त और वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिये भारत का पुनः मौका क्यों न दिया जाय, क्या राष्ट्र को विकास के वजाय केवल जनता को भ्रमित करके सत्ता प्राप्त कर ऐन-केन प्रकारेण भारत को पाकिस्तान और श्रीलंका की तरह विदेशी सरकारों का उपनिवेश ही बनाये रखा जाय और क्या हर बार भारत को इस एकल मतदाता प्रणाली के माध्यम से कभी दलितिस्तान, कभी पिछड़िस्तान या पाकिस्तान के रूप में पुनः कई टुकड़ों में होने के लिये छोड़ दिया जाय और भारत को खण्ड-खण्ड कर दिया जाय। यहीं सोंच भारतीय जनता की होनी चाहिए, इस पर समाज के अगुओं को गम्भीर मनन् करना चाहिए, और समाज को जागरूक किया जाना चाहिए।

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