सिद्धार्थनगर : राजस्व कर्मियों पर, राजस्व परिषद में भी सुधार की जरूरत,जनपद मे स्थिति खराब -दैनिक बुद्ध का संदेश संवाददाता के अनुसार

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एम0पी0सिंह की एक रिर्पोट
सिद्धार्थनगर- जनपद में कृषि विवादो में राजस्व अधिकारी जो कृषि विवादों के न्यायालय भी है, उनके द्वारा समस्त धरातलीय आख्यांए राजस्व लेखपाल और राजस्व निरीक्षक एवं तहसीलदार के माध्यम में मंगाकर उसी के आधार पर अपने अभिमत और निष्कर्ष दिये जाते है, जिले में बहुत से विवादो में राजस्व लेखपाल और राजस्व निरीक्षक के विधि विरूद्ध आख्यांए राजस्व वादो के निपटारे में इंसाफ पर प्रतिकूल प्रभाव डालती जा रही है।

कोतवाली/ब्लाॅक लोटन, तहसील नौगढ़ के महेन्द्र पुत्र फेंकू की शिकायत रही कि ग्राम-तरघौना स्थित गाटा संख्या-260 की भूमि से सम्बन्धित विवाद का निपटारा सिर्फ इसलिये नहीं हो पा रहा है, क्योंकि हल्का लेखपाल तरघौना, राजस्व निरीक्षक लोटन एवं तहसीलदार स्तर पर विधि द्वारा अपेक्षित प्राविधानों का पालन नहीं किया गया, संक्षेप में पीड़ित की शिकायत यह भी कि गाटा संख्या-260 की भूमि का अंश सन् 1987 लगायत 1994 तक एक अनुसूचित जाति के व्यक्ति आफत द्वारा कई लोगों को रजिस्टर्ड बैनामे के माध्यम से विक्री कर दिया गया, किन्तु अशिक्षितों की जानकारी या बुद्धिजीवियों का छल कहिये या तत्कालीन विधि का अनुपालन कड़ाई से न किये जाने के कारण बिना कलेक्टर की अनुमति उक्त भूमि की रजिस्ट्री हो गयी, जब नामांतरण की बात आई तो राजस्व कर्मचारियों और तहसीलदार स्तर पर विधि विरूद्ध प्रक्रिया अपनायी गयी, न तो विक्रीत भूमि राज्य सरकार में निहित की गयी, न ही क्रेताओं के हक में नामांतरित की गयी। सन् 1996 में क्षेत्रीय भूमाफिया द्वारा उक्त स्थित का लाभ उठाते हुए पूर्व विक्रेता आफत को असम्यक प्रभाव में लेकर विक्रीत एवं अवशेष सम्पूर्ण भूमि गाटा संख्या-260 क्रय कर ली गयी और इसके लिये नुमाइसी अनुमति एक दिवस में ही कलेक्टर से प्राप्त कर ली गयी। तथा कब्जाशुदा फेंकू समेत कई किसानों को राजस्व और पुलिस बल की मदद् से उक्त बाद की रजिस्ट्री के आधार पर नामांतरण करवाकर कब्जा कर लिया गया और पीड़ित पक्ष दर्जनों वाद अपने अधिकारों के लिये विभिन्न न्यायालयों में चलाते रहे तथा भूमाफिया डरवश अपनी विधि विरूद्ध क्रय भूमि अच्छे मूल्या पर बेचा जाने लगा, न तो उच्चाधिकारियों ने उक्त विवाद पर त्वरित फैसला लिया और न ही पुनर बिक्री को रोकने का प्रयास किया, आज हालत यह है कि राजस्व लेखपालों और राजस्व निरीक्षक एवं तहसीलदार की गलत आख्याओं के चलते एक साधारण मसला जो एस0डी0एम0 स्तर तक सुलझ सकता है, वह अनसुलझा ही रह गया और राजस्व तथा सिविल अदालतो, यहां तक की मा0 उच्च न्यायालय तक मामले अभी तक 40 वर्षो से लम्बित चले आ रहे है। जिसका कारण राजस्व निरीक्षको और तहसीलदारों की सिर्फ इतनी आख्या कि जो भूमि विधि विरूद्ध बिक्री या क्रय की गयी वह राज्य सरकार में निहित होनी चाहिए, तथा बाद के क्रेता का नामांतरण उसके अधीन होना चाहिए। आज तक पीड़ित पक्ष शिकायते करते-करते थक गये किन्तु राजस्व परिषद लगायत मण्डल तक इस मसले का निपटारा सिर्फ इसलिये नहीं हो सका क्योंकि तहसीलदार और राजस्व निरीक्षक इस मसले पर विधि की प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे है, जिसके लिये पीड़ित पक्ष द्वारा राजस्व परिषद तक गुहार लगायी गयी।

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