आरक्षण श्राप या वरदान, क्यों आरक्षण पर हो रही राजनीति ? -दैनिक बुद्ध का संदेश संवाददाता अमित श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ देवरिया

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अमित श्रीवास्तव ब्यूरो चीफ देवरिया 

देवरिया :- स्वर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दे देने से क्या भाजपा को सामान्य वर्ग के वोट मिल पाएंगे ? आर्थिक दृष्टि से कमजोर वाला फार्मूला क्या आरक्षित वर्ग पर भी लागू होगा। मई 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 7 जनवरी 2019 को केन्द्र की भाजपा सरकार ने स्वर्णों को सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है। यह लाभ उन्हीं सवर्णों को मिलेगा जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर होंगे। केबिनेट में पास इस प्रस्ताव को भाजपा अब संसद से पास करवाएगी।

उम्मीद है कि 8 जनवरी को संसद के शीतकालीन सत्र के अन्तिम दिन इस प्रस्ताव को लोकसभा में पेश कर दिया जाएगा। मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से पूर्व बजट सत्र में केन्द्र सरकार इस बिल को पास करवा पाएगी या नहीं, यह समय ही बताएगा। लेकिन सवाल यह है कि आर्थिक दृष्टि से कमजोर वाला जो फार्मूला स्वर्णों के आरक्षण पर लागू किया गया है, वह क्या एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग पर भी लागू हो पाएगा ? कई बार यह मांग उठी है कि आरक्षित वर्ग में भी क्रीमिलेयर का मापदण्ड निर्धारित किया जाएं। यानि जो परिवार आरक्षण का लाभ लेकर क्रीमिलेयर की श्रेणी में आ गए हैं, उन्हें आरक्षण की सुविधा से वंचित किया जाएं। यानि आरक्षित वर्ग में पहले आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवार वालों को लाभ मिले। हालांकि इस मुद्दे पर आम सहमति नहीं बन पाई है, लेकिन 7 जनवरी को केन्द्र सरकार ने अपने स्तर पर स्वर्णों के लिए आरक्षण देने के मामले में आर्थिक दृष्टि से कमजोर वाला फार्मूला लागू कर दिया है।

अब देखना होगा कि सरकार की नजर में स्वर्ण वर्ग में आर्थिक दृष्टि से कमजोर कौनसे परिवार होंगे। अलबत्ता केन्द्र सरकार अपनी इस घोषणा को सामान्य वर्ग के लिए महत्वपूर्ण मान रही है। इसीलिए यह सवाल भी उठा है कि क्या लोकसभा के चुनाव में भाजपा को इससे कोई फायदा होगा ? हालांकि भाजपा के नेता पहले से मांग करते आ रहे हैं कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए। यह मांग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से भी की गई थी। लेकिन सम्पूर्ण आरक्षण को आर्थिक आधार पर लागू करने की हिम्मत किसी भी राजनीतिक दल की सरकार में नहीं है। इसीलिए अब भाजपा सरकार ने आर्थिक दृष्टि से कमजोर स्वर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है। हालांकि इससे मध्यमवर्गीय स्वर्णों के युवाओं के लिए अवसर और कम हो जाएंगे। संविधान में पहले ही 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जा चुका है और अब 10 प्रतिशत और बढ़ जाने से मध्यमवर्गीय परिवार के युवाओं के लिए मात्र 40 प्रतिशत ही स्थान रह जाएंगे।आरक्षण व्यवस्था से दलितों व मुस्लिमों पर हो रही थी राजनीति अब स्वर्णो के साथ भी राजनीति शुरू वैसे आरक्षण व्यवस्था एक निश्चित समय सीमा के तहत उन गरीब असहाय दिन दुखीयों के लिए बनाया गया जिनका उत्थान नहीं हो रहा था सत्ता के लालचीयों ने उस व्यवस्था को जातीय आधार पर लागू किया जिसका लाभ व्यवस्था के अन्तर्गत पात्रों को न मिला न कभी मिलेगा आरक्षण व्यवस्था की समय सीमा समाप्त होने के बाद भी सत्ता के लालचीयों द्वारा न सही रूप में संशोधन किया जा रहा है न ही हटाया जा रहा है आज देश की सबसे बड़ी अहितकारी आरक्षण है शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण देश के होनहारों का भविष्य चौपट कर भ्रष्टाचार का मुख्य कारण बना हुआ है शिक्षा में आरक्षण व्यवस्था के पहले गुरु जी मान और सम्मान के लिए शिक्षा क्षेत्र में आते थे आज के समय में आराम के लिए इस क्षेत्र में गुरु के जगह सर जी आरक्षण की डिग्री लिए आ रहे हैं जिन्हें शुध्द मात्रा का ज्ञान नहीं वो देश का भविष्य बना रहे हैं। यही देश की गन्दी राजनीति का कुशल परिचय है कोई भी सरकारें गन्दी राजनीति से देश का भविष्य उज्जवल नहीं बना सकतीं न वास्तविक स्थिति को सुधारने में सफल हो सकतीं हैं सही और संस्कारी शिक्षा ही देश की उज्ज्वल भविष्य में सहायक हो सकती है।पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार को आरक्षण व्यवस्था सही रुप से लागू करने या आरक्षण समयसीमा समाप्त होने का हवाला देते समाज व देश हित में इस कुप्रथाओं को हटाने की जरूरत थी। सत्ता के लालच में इन कुप्रथाओं को हटाने या सही रूप देने का फैसला नहीं किया। बल्कि अम्बेडकर जयंती पर पानी पी पी कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था मेरे जीते जी आरक्षण व्यवस्था पर आंच नहीं आयेगी उसी दिन सामान्य वर्ग व आरक्षण के वास्तविक जरूरत मंदो को समझ आ गया भाजपा सरकार भी आरक्षण से दलित बेटी मायावती, मुलायम, लालू, जैसे को आरक्षण का लाभ देना चाहती है। कोर्ट ने आरक्षण से नौकरियों में प्रमोशन को गलत ठहराते हुए मुल पदों पर भेजने का आदेश दिया था तो केंद्र की भाजपा सरकार ने उस फैसले पर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कराया और अपनी मंशा प्रकट की खामियाजा लगातार 2014 चुनाव बाद भाजपा भुगत रही है एक तरफ देश के होनहारों की हाय तो दूसरी तरफ से पेट पर लात खा मृत्यु को गले लगाने वाले शिक्षा मित्रों की आत्माओं की बद्दुआ केंद्र सरकार पर लगती दिख रही है ऐसे ही हाय लगती रही तो 2019 लोकसभा भाजपा के लिए अहितकारी होगा। गरीब जरूरत मंद आरक्षण की मांग को लेकर रोड़ से सरकार तक पहुंचने में सदा असफल रहा है जिसका लाभ जाती आरक्षण के नाम पर सर्व सम्पन्न लोगों द्वारा उठाया जा रहा है। वास्तविक रूप से अम्बेडकर के सपनों को ना साकार किया गया न किये जाने का उम्मीद है। अब अम्बेडकर के सपनो को सामान्य वर्ग में दो फाड़ कर उनके सपने को साकार करने भाजपा सरकार चल पड़ी है। आरक्षण युक्त भारत देश में राजा गदहा घोड़ा प्रजा वाली कहावत चरितार्थ कराया जा रहा है। वैसे तो अन्धेरपुर नगरी चौपट राजा टका शेर भाजी टका शेर खाजा वाली कहावत आजादी के बाद सत्ता के भूखों पर बिलकुल सटीक बैठ चुकी है। पहले जमाने में लिखा पढी के जगह बुद्धिजीवी वर्ग को रखा जाता था तब कागजी कार्य सही संम्पादीत होती थी आज त्रुटियों से भरी सरकारी लेखनी कार्य हो रही है। जिससे आम जन प्रताड़ित हो रहा है आज के समय में सभी कार्य लगभग कम्प्यूटर से संम्पादीत किया जानें लगा है आरक्षण डिग्रीधारी मूंछ को पुंछ पढाने का कार्य कर देश के भविष्य को संवारने का काम कर रहे हैं आरक्षण से आये सर जी से शिक्षा ग्रहण कर कम्प्यूटर बाबू मूंछ की जगह पुंछ लिख आम जन को पुनः सुधार कराने और परेशान कर रिश्वतखोरी का काम कर करा रहे हैं ये सब भ्रष्टाचार का जड़ गलत तरीके से दिया गया आरक्षण की देन है। आरक्षण व्यवस्था से सर्वाधिक नुकसान दलित और मुस्लिमों को ही है आम धारणा है कि आरक्षण व्यवस्था का सर्वाधिक लाभ दलितो को मिला है और ब्राह्मण-बनिया-राजपूत सर्वाधिक नुकसान में रहा है, जबकि हकीकत इसके विपरीत है-सबसे पहले आते हैं दलितो पर। जब संविधान बना तो जिस बात को प्राथमिकता दी गई वो थी सदियों से चले आ रहे भेद-भाव को दूर करना। इसके लिए दो रास्ते सुझाए गए-(1). व्यापक एवं स्थाई समाधान व (2). सीमित  एवं अस्थाई समाधान। व्यापक एवं स्थाई समाधान का रास्ता था- समान भूमि वितरण या भूमि सुधार का कार्यक्रम तथा सीमित व अस्थाई समाधान था दस वर्ष के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था। जैसा कि सर्वविदित है कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों का नेतृत्व भू पतियों और पूंजी पतियों के हाथ में था, तब भी और आज भी। इसलिए न तो भारत में और न ही पाकिस्तान में कभी भी भूमि सुधार हो सके। भारत में केवल पश्चिमी बंगाल ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां पर कुछ हद तक भूमि सुधार हुआ है।इसके अतिरिक्त भारत में कहीं भी भूमि सुधार कार्यक्रम गति नहीं पकड पाया। परिणाम यह हुआ कि दलित वर्ग जो हमेशा से कृषि या भूमि से जुडा हुआ था भूमि से वंचित ही रह गया। भूमि सुधार के अभाव  में दलित की स्थिति में कोई अपेक्षित परिवर्तन हो ही नहीं सकता था सो कदापि नहीं हो सका।आज जिस किसी दलित के पास भी थोडी-बहुत कृषि भूमि है, अपने सम कक्षीय या सम जातीय दलितों से बहुत अच्छी स्थिति में है। ऐसे में यदि सभी दलितों के पास भूमि होती तो उनकी स्थिति कहीं बेहतर होती जैसा कि बताया जा चुका है कि उस समय कांग्रेस में भू पतियों का बोलबाला था और आज भी है, ने कभी भी भूमि सुधार के लिए सार्थक कदम नहीं उठाए जिससे दलितो के हिस्से की भूमि आज तक प्रभावशाली जमीदार लॉबी दबाए हुए है। कांग्रेस ने कुछ दिन भूमि सुधार का नाटक भी किया लेकिन कभी जन विरोध का बहाना बनाकर तो कभी आम सहमती बनाने का बहाना बनाकर इसे लगातार टालती रही। जब मांग ज्यादा उठी तो बिनोवा भावे को भू-दान आंदोलन का नाटक करने के लिए आगे कर दिया कुल मिलाकर एक ही उद्देश्य था कि भूमि सुधार को किसी न किसी तरह से टाला जा सके।आज तो कोई जानता भी नहीं कि ऐसा कोई संवैधानिक उद्देश्य भी था। भूमि सुधार जो एक स्थाई व व्यापक समाधान था समता मूलक समाज बनाने का, के स्थान पर कांग्रेस ने “आरक्षण” को चुना जिससे समाज न केवल विभिन्न जातियों और वर्गों में बट गया अपितु दलित-दलित के बीच की खाई भी बहुत चोडी हो गई। हां इससे दलित एक वोट बैंक के रूप में जरुर परिवर्तित हो गया बिना खुद परिवर्तित हुए यह कहना बहुत आसान है कि बस बी.ए. कर लो, कलेक्टर की नोकरी पक्की है। कल्पना कीजिए 1947 में जब भारत में समग्र साक्षरता दर ही 15 % से कम थी तब कितने दलित पढे-लिखे थे जो आरक्षण का लाभ ले पाने की स्थिति में थे ? यह तो वही बात हुई कि किसी के पास भोजन करने के लिए दस रुपए भी न हो और उससे कहा जाए कि लो आपको एक करोड की फरारी एक लाख में ले लो। बात आरक्षण और उससे प्राप्त नोकरी की भी नहीं थी, बात यह भी है कि उस समय नौकरी को हैसियत सुधारने का जरिया भी नहीं माना जाता था अपितु उस समय तो नौकरी को निकृष्टता या हेय दृष्टि से ही देखा जाता था। ऐसे में यदि कोई नौकरी लग भी जाता था चाहे वह दलित हो या स्वर्ण, उसकी हैसियत में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता था। इसका कारण था उस समय वेतन अत्यधिक कम होना जिससे नौकरी के लिए न तो कोई प्रतिष्ठा थी और न ही मारा-मारी, जैसा कि आज दिखाई पडता है। बढती हुई आबादी के साथ जैसे-जैसे नौकरियों में मारा मारी बढने लगी वैसे-वैसे जातीय व्यवस्था कमजोर पडने लगी। अब जातीय व्यवस्था का स्थान वर्गीय व्यवस्था ने ले लिया। परिणाम यह हुआ कि बहुत से शातिर लोग भी चोर रास्ते से दलित वर्ग में घुस गए। छतीस गढ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी इसका निकटस्थ उदाहरण है जो एसटी वर्ग से न होते हुए भी इस वर्ग में घुसकर वो तमाम लाभ चुराकर ले गया जो इस वर्ग के लिए आरक्षित किए गए थे। इस प्रकार से आरक्षण 1% शातिर लोगों की बपौती बनकर रह गया और शेष 99% दलित वहीं के वहीं रह गए। एक तरफ तो जातीय व्यवस्था कमजोर पडती गई दूसरी तरफ वर्गीय व्यवस्था मजबूत होती गई। इस नवीन वर्गीय व्यवस्था का नेतृत्व किया उन तथाकथित दलितों ने जो या तो कभी भी दलित थे ही नहीं या फिर आरक्षण की सीढी चढकर उपरी पाएदान पर पहुंच चुके थे।असल में ये 1% साधन-संपन्न तथाकथित दलित ही अपने ही शेष 99% दलित भाइयों के विकास में सबसे बडा रोडा बनकर खडे हो गए है। ये किसी भी स्थिति में अपना स्थान अपने वंचित दलित बंधुओं के लिए छोडने को लिए तैयार नहीं हैं जिनके पास साधनों का नितांत अभाव है। ऐसा भी नहीं कि आरक्षण के लाभ से वंचित यह दलित इस स्थिति से अनजान है और उनमें इसे लेकर रोष नहीं है कि उनके हिस्से का लाभ साधन-संपन्न लोग हडप रहे हैं, लेकिन एक तो उनकी भावनाओं को आवाज देने वाला कोई नहीं है और दूसरा- जैसा कि उपर बताया गया है अब जाति के स्थान पर वर्ग हावी हो चुका है जिससे वंचित व्यक्ति चाहकर भी अपनी आवाज नहीं उठा सकता इसलिए आज नहीं तो कल संपन्न दलित और वंचित या अति दलित की आवाज जरुर उठेगी जैसे कि बिहार में पिछडे और अति पिछडे की उठी है और जिसके बूते नितिश ने 10 साल राज किया और जरूरत मंदो की सिर्फ धोखा दिया। आश्चर्य की बात है कि आरक्षण का लाभ प्राप्त कर चुके लोगों को बाहर निकालने की मांग आरक्षण से वंचित दलित लोगों की तरफ से नहीं आ रही जहां से आनी चाहिए थी जैसा कि अति पिछडे वर्ग ने लाभार्थी या साधन-संपन्न पिछडे वर्ग के विरुद्ध उठाई है। इसका कारण यही है कि जातीय के स्थान पर वर्गीय व्यवस्था में उपर बैठे 1% लोग नीचे के 99% लोगों को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हो गए है कि आप तो हमारी संपन्ता देखकर खुश हो लो; हामारी खुशी में ही आपकी खुशी है। यही कारण है कि एक बेरोजगार दलित युवक जो ओवर ऐज हो चुका है या होने के करीब है अपना रोष प्रकट नहीं करता कि कलेक्टर के बेटे को मेरे हिस्से का रिजर्ववेशन क्यों दिया जा रहा है ? यह ठीक वैसे ही है जैसे पिछले दिनों ओबीसी की क्रीमी लेयर की सीमा को 4.5 लाख से बढाकर 6 लाख किए जाने पर किसी भी ओबीसी ने आपत्ति दर्ज नहीं करवाई जबकि यह निर्णय 90% ओबीसी वालों के ही विरुद्ध था। यह तो हुई दलित वर्ग की बात जिनमें 99% लोग आज भी वहीं है जहां वो आजादी के समय थे। इसका एक ही कारण है वो यह कि भूमि सुधार के स्थान पर आरक्षण व्यवस्था को लागू किया गया और वह भी सही तरीके से लागू नहीं किया गया। अब आते हैं मुस्लिम समाज पर-आरक्षण व्यवस्था से दलित बर्ग के बाद यदि कोई नुकसान में रहा है तो वो है मुस्लिम वर्ग। कारण ? कारण यह कि एक तो मुस्लिम वर्ग वैसे ही शिक्षा में पिछडा हुआ था, उपर से कसर मदरसा शिक्षा ने पूरी कर दी जो प्रतिसपर्धा में टिक नहीं पाती। मुस्लिम महिला शिक्षा के मामले में तो स्थिति कितनी दयनीय है, कहने की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसे में जब 50 % पद आरक्षित हो जाते थे और उनमें से भी 30 % महिलाओं के लिए तो शेष 35 % पद ऐसे बचते है जिन पर सभी फॉइट करते है। इन 35% में भी 20% से अधिक पद पर ओबीसी वाले कब्जा कर लेते है। शेष बचे 15% पद ही ऐसे होते है जिस पर ब्राह्मण, बनिया, राजपूत, कारस्थ व मुस्लिम आ पाते है। अब मुस्लिम खुद अंदाजा लगा लें कि अपनी शैक्षिणिक पृष्ठभूमि को देखते हुए वे ब्राह्मणो, कायस्थों व बनियों के मुकाबले कितने सफल होते होंगे ? इतना होते हुए भी आश्चर्य की बात है कि मुस्लिमानों ने आज तक कभी आरक्षण का विरोध नहीं किया अपितु इस आस में खुद को ठगता और ठगाता रहा कि शायद कांग्रेस या शायद मुलायम या शायद कोई और उन्हें भी आरक्षण दे देगा जबकि वो भी अच्छे से जानता है कि ऐसा संभव नहीं है और ये झूठे आश्वासन देने वाले को केवल और केवल उनके वोटो से मतलब है। सेना और न्यायालय इसके अच्छे उदाहरण है जहां मुसलमानों का अच्छा-खासा प्रतिनिधित्व है क्योंकि वहां आरक्षण नहीं है। मेरा तो यही विचार है कि मुसलमानों को आरक्षण मांगने के स्थान पर खत्म करने की मांग करनी चाहिए। अपनी स्थिति सुधारने के लिए इसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।

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